कलियुग की बदलती मानवीय संवेदनाएं – धनेश कुमार सिंह

हितवाद टाइम्स कोरबा – एक समय था जब किसी व्यक्ति के निधन के बाद, चाहे उसके जीवन में कितनी भी कमियाँ क्यों न रही हों, लोग उसके प्रति सम्मान व्यक्त करते थे। यही कहा जाता था—“अच्छा आदमी था… नेक इंसान था… ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे।”
लेकिन आज का समय इतना बदल गया है कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद भी उसके विरुद्ध आलोचनाओं और कटु टिप्पणियों का सिलसिला थमता नहीं। अभिनेता नाना पाटेकर को लेकर सामने आ रही कुछ टिप्पणियाँ देखकर मन सचमुच व्यथित हो जाता है।
मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, किसी के व्यक्तित्व या कार्यों की आलोचना भी लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मृत्यु के बाद संवेदनशीलता, मानवीयता और सम्मान बनाए रखना हमारी संस्कृति की पहचान रही है।
जिस समाज में मृत्यु के बाद भी इंसान के लिए दो सम्मानजनक शब्द कहने की परंपरा थी, यदि वहाँ भी हम कटुता और आलोचना को नहीं रोक पा रहे हैं, तो सचमुच यह सोचने का विषय है कि क्या हम कलियुग के उस दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ संवेदनाएँ भी धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं?
मृत्यु किसी विचारधारा की जीत या हार नहीं होती—वह मनुष्य की अंतिम यात्रा होती है।
उस समय कम से कम हमारी भाषा में इंसानियत जीवित रहनी चाहिए।